Roza Kholne Ki Dua in Arabic, Roman English & Meaning | Iftar Ki Masnoon Dua
Roza Kholne Ki Dua in Arabic, Roman English & Meaning (रोज़ा खोलने की दुआ)
रमज़ान का रोज़ा सिर्फ भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि यह सब्र, इबादत और अल्लाह की याद का महीना है। दिन भर का रोज़ा जब इफ्तार के वक्त पूरा होता है, तो मुसलमान के लिए यह बेहद खुशी और कबूलियत का लम्हा होता है।
इसी समय Roza Kholne Ki Dua पढ़ना सुन्नत है। हदीस में आता है कि रोज़ेदार की दुआ इफ्तार के वक्त रद्द नहीं की जाती।
इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि रोज़ा खोलते समय सही दुआ पढ़े, उसका मतलब समझे और दिल से अल्लाह से मांगें।
Roza Kholne Ki Dua in Arabic
اللَّهُمَّ إِنِّي
Roza Kholne Ki Dua in Roman English
Allahumma inni laka sumtu wa bika aamantu wa ‘alayka tawakkaltu wa ‘ala rizqika aftartu.
Roza Kholne Ki Dua Meaning in Hindi
ऐ अल्लाह! मैंने तेरे लिए रोज़ा रखा, तुझ पर ईमान लाया, तुझ पर भरोसा किया और तेरे दिए हुए रिज़्क से इफ्तार किया।
दूसरी मस्नून दुआ (Hadith se)
Arabic
ذَهَبَ الظَّمَأُ وَابْتَلَّتِ الْعُرُوقُ وَثَبَتَ الْأَجْرُ إِنْ شَاءَ اللَّهُ
Roman
Dhahaba az-zama’u wabtallatil ‘urooqu wa thabatal ajru in shaa Allah.
Meaning
प्यास खत्म हो गई, रगें तर हो गईं और अगर अल्लाह ने चाहा तो सवाब पक्का हो गया।
(अबू दाऊद)
Roza Kholne Ki Dua Kab Padhi Jati Hai?
यह दुआ इफ्तार करते वक्त, यानी पहला निवाला या पहला घूंट लेने से ठीक पहले या साथ में पढ़ी जाती है।
अक्सर लोग खजूर या पानी से इफ्तार करते हैं, जो सुन्नत तरीका है।
Iftar Ke Waqt Dua Ki Fazilat
हदीस के मुताबिक:
✅ रोज़ेदार की दुआ ठुकराई नहीं जाती
✅ इफ्तार के समय रहमत के दरवाज़े खुलते हैं
✅ यह कबूलियत का खास लम्हा होता है
इसलिए सिर्फ दुआ पढ़कर खत्म न करें, बल्कि अपने, अपने परिवार और पूरी उम्मत के लिए भी दुआ मांगें। नमाज़ का तरीका
Roza Kholte Waqt Kya Karna Chahiye?
👉 खजूर या पानी से इफ्तार करें
👉 दुआ पढ़ें
👉 अल्लाह का शुक्र अदा करें
👉 ज्यादा खाने में जल्दी न करें
👉 मग़रिब की नमाज़ की तैयारी करें
Roza Kholne Ki Dua Yaad Karne Ka Aasan Tarika
अगर आपको Arabic पढ़ने में मुश्किल होती है, तो Roman English पढ़कर याद करें।
रमज़ान से पहले या शुरू के दिनों में रोज़ पढ़ेंगे तो अपने आप याद हो जाएगी।
🌙 Roze Ki Fazilat (रोज़े की फज़ीलत)
रोज़ा इस्लाम की सबसे खास इबादतों में से है। यह सिर्फ भूख और प्यास का नाम नहीं, बल्कि नफ़्स पर कंट्रोल, सब्र, और अल्लाह से करीब होने का जरिया है।
📖 हदीस में रोज़े की शान
1️⃣ रोज़ा सिर्फ अल्लाह के लिए है
नबी ﷺ ने फरमाया:
“इब्ने आदम का हर अमल उसके लिए है, मगर रोज़ा मेरे लिए है और मैं ही उसका बदला दूँगा।”
📚 Reference: Sahih al-Bukhari (1904), Sahih Muslim (1151)
यानी रोज़े का सवाब कितना है — यह सिर्फ अल्लाह जानता है।
2️⃣ रोज़ा जहन्नम से ढाल है
हदीस:
“रोज़ा आग से बचाने वाली ढाल है।”
(बुख़ारी)
3️⃣ रोज़ेदार के मुंह की खुशबू
नबी ﷺ ने फरमाया:
“अल्लाह के नज़दीक रोज़ेदार के मुंह की खुशबू कस्तूरी से ज्यादा प्यारी है।”
(मुस्लिम)
4️⃣ रोज़ेदार के लिए जन्नत का खास दरवाज़ा
जन्नत में एक दरवाज़ा है “रैयान”, जहां से सिर्फ रोज़ेदार दाखिल होंगे।
(बुख़ारी)
🎬 Tarikhi Kahani – Ek Roze Ki Qeemat
गरमी का दिन था…
रेगिस्तान की हवा आग उगल रही थी।
एक बूढ़ा आदमी, सफेद दाढ़ी, कमजोर जिस्म… लेकिन आँखों में अजीब सी रोशनी।
वो सफर में था। लोग हैरान थे — “इतनी उम्र, इतनी गर्मी… फिर भी रोज़ा?”
किसी ने कहा:
“बाबा, अल्लाह ने मुसाफिर को रुख्सत दी है, रोज़ा छोड़ दीजिए।”
बुजुर्ग मुस्कुराए… होंठ सूखे थे… मगर दिल तर।
उन्होंने जवाब दिया:
👉 “अगर आज छोड़ दूँ… तो क़यामत के दिन अल्लाह से क्या कहूँगा, जब वो पूछेगा – मेरी खातिर एक दिन भी सब्र नहीं कर सके?”
सूरज डूबने लगा…
आसमान नारंगी हुआ…
बुजुर्ग ने खजूर उठाई…
हाथ कांप रहे थे…
उन्होंने दुआ पढ़ी…
“ऐ अल्लाह, तेरे लिए रखा, तुझ पर भरोसा किया…”
और जैसे ही पहला निवाला लिया…
आँखों से आँसू बह निकले।
लोगों ने पूछा:
“बाबा, रो क्यों रहे हैं?”
उन्होंने कहा:
👉 “मुझे नहीं पता अगला रमज़ान मिलेगा या नहीं…
इसलिए हर रोज़ा ऐसे रखता हूँ जैसे ये मेरी जिंदगी का आखिरी रोज़ा हो।”
खामोशी छा गई…
किसी की हिम्मत नहीं हुई बोलने की।
रोज़ा सिर्फ फर्ज नहीं…
यह मुलाक़ात की तैयारी है।
यह हमें सिखाता है कि
एक दिन अल्लाह से मिलना है।
FAQs – Roza Kholne Ki Dua
❓ रोज़ा खोलने की दुआ पढ़ना जरूरी है?
सुन्नत है, पढ़ना बहुत फजीलत वाला है।
❓ क्या बिना दुआ के रोज़ा खुल जाएगा?
हाँ, रोज़ा हो जाएगा, लेकिन दुआ पढ़ने का सवाब नहीं मिलेगा।
❓ इफ्तार की सबसे अफ़ज़ल चीज़ क्या है?
खजूर और पानी।
❓ क्या अपनी भाषा में दुआ मांग सकते हैं?
हाँ, बिल्कुल। अल्लाह हर भाषा समझता है।
Conclusion
Roza Kholne Ki Dua सिर्फ कुछ अल्फाज़ नहीं, बल्कि अल्लाह का शुक्र अदा करने और उसकी नेमतों को मानने का तरीका है।
इफ्तार का समय बहुत कीमती होता है, इसे दुआ, शुक्र और इबादत में बिताना चाहिए।
अल्लाह हम सबकी दुआएं कबूल फरमाए। आमीन।