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Quran Surah 9 Ayat 5 in Hindi
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Quran Surah 9 Ayat 5 in Hindi: क़ुरान सूरह तौबा में क्या लिखा है?

Quran Surah 9 Ayat 5 in Hindi: क़ुरान सूरह तौबा में क्या लिखा है?

Quran Surah 9 Ayat 5 in Hindi
Quran Surah 9 Ayat 5 in Hindi

इस ब्लॉग पोस्ट में, हम सूरह 9, आयत 5 “Quran Surah 9 Ayat 5 in hindi“के विशेष मतलब और महत्व को विस्तार से विचार करेंगे। यह आयत मुशरिकों के साथ संघर्ष और उनके साथ व्यवहार के बारे में बात करती है, जैसे कि वे वाहिद अल्लाह के खिलाफ संघर्ष करते हैं। हम इस आयत के विभिन्न पहलुओं को समझेंगे और इसके धार्मिक और सामाजिक Perspective को समझने की कोशिश करेंगे।

Quran Surah 9 Ayat 5 in Hindi: क़ुरान सूरह तौबा को सही समझने का तरीका

क़ुरान की आयतें अपनी पूरी सन्दर्भ (context) के साथ समझी जानी चाहिए, खासकर सूरह तौबा की आयत 5, जिसे अक्सर “आयत-ए-सैफ” कहा जाता है। यह आयत कई बार ग़लतफहमियों का शिकार हुई है, जबकि इसे सही मायने में समझने के लिए इसके पहले की आयतें (1-4) पढ़ना बेहद ज़रूरी है।

सूरह तौबा: 1-4 की पृष्ठभूमि
सूरह तौबा मदीना के उस समय नाजिल हुई थी जब मुसलमानों और मक्का के मुशरिकों के बीच संधि (treaty) टूट चुकी थी। यह आयतें उन लोगों के बारे में हैं जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल के साथ धोखा किया और संधि का उल्लंघन किया। इन आयतों में साफ तौर पर उन मुशरिकों के लिए इज़ाज़त दी गई है जो बार-बार जंग छेड़ रहे थे।

आयत 5 में अल्लाह तआला ने हुक्म दिया कि उन दुश्मनों से लड़ा जाए जो मुसलमानों के खिलाफ खड़े थे। लेकिन यह हुक्म सिर्फ़ उन लोगों के लिए था जिन्होंने संधि तोड़ी और खुले तौर पर दुश्मनी की। यह किसी भी सूरत में आम लोगों पर लागू नहीं होता।

आयत 5 को सही तरीके से समझना
आयत कहती है:

यह आदेश केवल उन मुशरिकों के लिए था जो दुश्मनी पर अड़े हुए थे। अल्लाह के नज़दीक हर जुल्म के खिलाफ इंसाफ कायम करना जरूरी है, और यह आयत इंसाफ के उसूल पर आधारित है।

गलतफहमी को दूर करें
जो बन्दा इस Varse का गलत मतलब निकालकर अपने Motive के लिए यूज़ करते हैं, वो इसे इसके असल हवाला में नहीं देखते। इसे सही अंदाज़ में समझने के लिए varse 1-4 का इहतियातसे मुताला करें, जो वाज़ेह करती हैं कि ये आयत उन मुशरिकों के लिए थी जो खुलकर दुश्मनी करते थे।

Surah 9 Ayat 5: Hindi Translation

Understand the Meaning of Quran Surah 9 Ayat 5 in Hindi
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सूरह तौबा की आयत 1-4: आसान ज़बान में समझें

सूरह तौबा की शुरुआती आयतें उस समय की स्थिति को बयान करती हैं जब मुसलमान और मक्का के मुशरिकों के बीच एक समझौता (संधि) हुआ था। लेकिन कुछ मुशरिकों ने इस समझौते को तोड़ दिया और धोखा दिया। इन आयतों में अल्लाह तआला ने मुसलमानों को साफ तौर पर बता दिया कि जो लोग अपनी दुश्मनी पर अड़े हुए हैं और बार-बार समझौते का उल्लंघन कर रहे हैं, उनके साथ कोई समझौता नहीं हो सकता।

आयत 1अल्लाह और उसके रसूल की ओर से उन मुशरिकों के लिए ऐलान है जिन्होंने मुसलमानों के साथ किए गए समझौते को तोड़ा। अब उनके साथ संधि खत्म की जा रही है।
आयत 2ऐलान के बाद उन्हें चार महीने की मोहलत दी गई ताकि वे अपनी स्थिति को सुधार लें। लेकिन अगर वे नहीं मानते, तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
आयत 3तीसरी आयत में साफ तौर पर मक्का में ऐलान करने का हुक्म दिया गया कि अल्लाह और उसके रसूल अब उन मुशरिकों से बरी (अलग) हैं जिन्होंने धोखा दिया। अगर वे तौबा कर लें और सही राह पर लौट आएं, तो उन्हें माफ किया जाएगा। लेकिन अगर वे दुश्मनी पर कायम रहते हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई तय है।
आयत 4यहां उन मुशरिकों का ज़िक्र है जिन्होंने संधि का पालन किया और किसी तरह की धोखेबाजी नहीं की। उनके साथ मुसलमानों को वफादारी बरतने का हुक्म दिया गया है।
  1. आयत 1:
    अल्लाह और उसके रसूल की ओर से उन मुशरिकों के लिए ऐलान है जिन्होंने मुसलमानों के साथ किए गए समझौते को तोड़ा। अब उनके साथ संधि खत्म की जा रही है।
  2. आयत 2:
    ऐलान के बाद उन्हें चार महीने की मोहलत दी गई ताकि वे अपनी स्थिति को सुधार लें। लेकिन अगर वे नहीं मानते, तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
  3. आयत 3:
    तीसरी आयत में साफ तौर पर मक्का में ऐलान करने का हुक्म दिया गया कि अल्लाह और उसके रसूल अब उन मुशरिकों से बरी (अलग) हैं जिन्होंने धोखा दिया। अगर वे तौबा कर लें और सही राह पर लौट आएं, तो उन्हें माफ किया जाएगा। लेकिन अगर वे दुश्मनी पर कायम रहते हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई तय है।
  4. आयत 4:
    यहां उन मुशरिकों का ज़िक्र है जिन्होंने संधि का पालन किया और किसी तरह की धोखेबाजी नहीं की। उनके साथ मुसलमानों को वफादारी बरतने का हुक्म दिया गया है।

आसान शब्दों में समझें:

इन आयतों में अल्लाह तआला ने इंसाफ का एक ज़बरदस्त उसूल दिया है: जो लोग अपने वादों पर कायम हैं और शांति चाहते हैं, उनके साथ अमन और वफादारी बरती जाए। लेकिन जो लोग बार-बार धोखा देते हैं और दुश्मनी फैलाते हैं, उनके खिलाफ सख्ती की जाए।

chapter 9 verse 5 quran
surah taubah ayat 9 5

अगर आप सूरह तौबा और क़ुरान की अन्य आयतों को सही सन्दर्भ में समझना चाहते हैं, तो इसे पूरे संदर्भ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ पढ़ें। क़ुरान को टुकड़ों में नहीं, बल्कि पूरी कहानी के साथ पढ़ने से ही सच्चाई का पता चलेगा।

Translation of Surah 9 Ayat 5

सूरह 9 आयत 5 का अनुवाद:

surah 9 ayat 5 in english

  • In English, the translation of Surah 9 Ayat 5 reads: “After the consecrated months have elapsed, confront the polytheists, apprehend them, besiege them, and lie in wait for them in every strategic position. However, if they repent, establish prayer, and pay alms, then allow them to go their way. Indeed, Allah is Forgiving and Merciful.”

सूरह 9 आयत 5 का तफसीर: Tafseer of Surah 9 Ayat 5

surah 9 5 explained” यह आयत जिन्हें आपने पूछा है, कई विवादों का विषय बनी है। इसकी सही तफसीर के लिए, स्थिरता और समझदारी की आवश्यकता है। अन्य कुरानी आयतों के साथ संदर्भ स्थापित करना और उनका संदेश समझना भी महत्वपूर्ण है। ध्यान देने वाली बात है कि तफसीर का उपयोग करते समय सतर्कता और जानकारी की आवश्यकता होती है।

फिर जब हुरमत वाले महीने निकल जाएं, तो मुशरिकों को मारो जहां मिले और उन्हें पकड़ो और कैद करो और हर जगह उनकी ताक में बैठो। फिर अगर वे तौबा करें और नमाज़ क़ाएम रखें और ज़कात दें तो उनकी राह छोड़ दो, बेशक अल्लाह बख़्शनेवाला मेहरबान है।

तफसीर सिरात अल-जनान

فَاِذَا انْسَلَخَ الْاَشْهُرُ الْحُرُمُ ”फइजा अंसलखल अल-अशहुरु अल-हुरूम:

koran sura 9 5″ फिर अगर वे पश्चाताप करें।” इस आयत का संक्षेप मतलब है कि क़ुफ़्फ़ार को अल्लाह के साथ शिर्क और अल्लाह ताला के रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की नबूत का इनकार करने से बाज आएँ।

और जिन महीनों में जंग अब्तई इस्लाम में हराम थीं वह रजब، ज़ीक़ाद, ज़ीअल-हिज़ाह और मुहर्रम हैं अब उन में जिहाद जाइज़ है क्योंकि यहाँ मुज़्कूर मुआहिदे की तकमील वाले चार महीनों में उन क़ुफ़्फ़ार से जंग हराम थी इस लिए उन्हें अशहुरे हुरूम फ़रमाया गया। (रूह अल-बयान, अल-तौबा, तह्त अल-आया: ५، ३ / ३८७)” नमाज़ सीखें

فَاِنْ تَابُوْا:“फइन ताबू:

chapter verse 5” फिर अगर वे तौबा करें। इस आयत का सार है कि क़ुफ़्फ़ार को अल्लाह के साथ शिर्क करने और अल्लाह ताला के रसूल हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नबूत का इनकार करने से मना किया गया था।

अगर क़ुफ़्फ़ार उन कामों को छोड़कर अल्लाह की वहदानियत का इक़रार कर लें, मूर्तियों की पूजा छोड़कर ईमानदारी से अल्लाह की इबादत करें, नबी एकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नबूत का इक़रार कर लें, नमाज़ क़ाएम करने और ज़कात अदा करने की फ़र्ज़ियत को मान लें तो उनका रास्ता छोड़ दो और उनकी जान और माल के दरपे न हो।

जो बंदा तौबा करता है, गुज़श्ता गुनाहों को छोड़कर अल्लाह की इत्ता में लग जाता है, तो अल्लाह उसकी तौबा कबूल फरमाता है और उसके गुनाह छुपा देता है। तौबा से पहले किए हुए गुनाहों पर तौबा के बाद सज़ा न देकर उस पर रहम फरमाता है।”

आम पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs):

सूरह 9 आयत 5 का अर्थ क्या है?

इस आयत में क्या कहा गया है और उसका अर्थ क्या है, यह जानने के लिए हमें क्या कदम उठाने चाहिए, इसकी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करें।

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9 Comments
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